फ़िज़ूली

बालकनी पर बैठे दो चिड़ियों को प्यार करते देखा है कभी? बात जीतनी मामूली है उतनी ही प्यारी भी। खैर चिड़ियों की बात तो मामूली है, पर जब दो अलग बालकनी की बात करी जाए, जैसे बीच में सड़क हो और आमने सामने घर, और हवाओ में महकता प्यार हो।

जब बालकनी सिर्फ बालकनी न होकर शोकेस हो जाए, जिसमे जवान दिलों के फूल खिले, तब बात कुछ और है।


सदफ फिरसे बालकनी पर बैठे उसका इंतजार कर रही थी, कॉफी हाथ में लिए, बेचैन दिल के साथ।


बात तो उस लड़के को भी अच्छी तरह पता है कि सदफ सिर्फ उसे ही देखने बालकनी पर आती है, फिर भी ये हिचकिचाहट कैसी?

सदफ का दिल जीतना खुला है.... उतना ही शर्मिला था वो बेवकूफ। 

आज सदफ का बेचैन होना भी जायज़ था, क्युकी कल जब वो आया था, अपनी बालकनी पर, हिचकिचा रहा था, नखरे कर रहा था, पर आखिर में पल भर के लिए सही, नज़रे मिल ही गई।

आंखे चुरा कर देखने का सिलसिला पिछले तीन दिनों से जारी था। हर रोज कुछ न कुछ नए इशारे होते। ये सब होने के बावजूद भी बात ज़रा कच्ची रह गई है। और उसी लालसा में सदफ बालकनी में हाजिरी लगाए बैठी है।

उसी पल के इंतजार में बेचैन।

बेचैनी ऐसी की कॉफी हाथ में है, पर पीने वाले को होश नही। एक लंबी रात के बाद सदफ फिरसे बालकनी पर है, सिर्फ इंतज़ार ही कर रही है उसका जो शायद हिम्मत जुटा रहा हो बाहर निकलने की।


इंतजार को खत्म करते हुए जब वो बाहर आया। 

उसने ऐसे अपने बाल सावरे जैसे उसे पता ही न हो की कोई उसे देख रहा है।

सदफ ने मुस्कुरा कर कॉफी पिया। 

लड़का बाल्कनी में रखे गमलों को पानी देने लगा।

सदफ उसका तमाशा देख रही थी और इंतजार कर रही थी कब लड़के की नज़र उसके मुस्कुराते चेहरे पर पड़े और गमलों से पानी बह जाए। 


बेशक, उस लड़के का दिल भी सदफ को देखने के लिए मचल रहा था, पर घबराहट ज़हन से उतर नही रही।


देखने के तरीके सोचते-सोचते सदफ को उसने इस कदर देखा, मानो, उसने सदफ को पकड़ लिया हो उसे घूरते हुए। 

अब गैरो की बालकनी में झांकने का इल्ज़ाम अकेले सदफ पर था। लकड़ा आंखो से ही पूछने लगा की "क्यू देखती हो ऐसे?"

सदफ के मुस्कुराते चेहरे ने ये गुनाह खुशी खुशी कबूल किया। 

लड़का अपनी मुस्कुराहट छिपा न पाया। उसने भी देखा सदफ को वैसे ही, जैसे वो उसे देखती है।

और शुरू हुई फिर वही बात, जिसे कहने की जरूरत नहीं।

नज़र और मुस्कुराहट से बात कुछ यूं चली की देखते ही देखते शाम हो गई और चिड़ियों को पता भी न चला। 


रात आई। बिस्तर पर लेटे-लेटे मुस्कुराना और प्यार भरे गाने सुनते जाना, ये लंबी रात सदफ को चिढ़ाए जा रही थी।

नींद और बेचैनी दोनो एक साथ सर पर हावी है।

इस बेसब्री को नींद में तब्दील करना आसान नहीं।

पर रात का काम है सुलाना, उसने सुला ही दिया..


बालकनी में खिलखिलाती धूप पड़ रही है। सुबह के 11 बजने को है।


देर तक सोने के लिए ताने सुनाती हुई उसकी अम्मा उसे कहती है

"शॉपिंग करने का प्लान था न आज? समय देखो, और तुरंत तैयार होजाओ। मैं और अब्बा निकल रहे है तुम मामू के साथ आना।"


अम्मा को पता था कि सदफ शॉपिंग के लिए पागल थी। 

पर सदफ ने आज जाने से मना कर दिया। 

अम्मा ने कुछ देर घूरने के बाद कहा "ठीक है फ़िर,  सोते राहो" 

और अब्बा के पास जाकर सदफ की शिकायत करने लगी। 


सदफ की अम्मा ने अब्बा और मामू को इस मामले में घसीट दिया। अब तीनो मिल कर सदफ से सवालात करने लगे। 

अब्बा ने कहा "बेटा शॉपिंग चलने को आपने ही तो कहा था, अब क्या हुआ?" 

मामू ने भी कहा "अभी नहीं जाओगी तो कब जाओगी?"

और फिर अम्मा ने जबरदस्ती करी। क्युकी वो और सदफ कपड़े हमेशा साथ में चुनती है।


आखिर में सदफ की हार हुई और उसे जाना पड़ा। 


एक अच्छा वक्त परिवार के साथ बिताने के बाद सब वापस लौटे। 


शाम के 5 बजे थे, खेलने का समय था, और समय था बालकनी पर जाने का। सदफ बालकनी में ही बैठी थी, मगर इस बार उसने खुद को परदे से ढक लिया था। जिससे वो दिखाई न दे। 

आज मिजाज़ गुमसुम सा था। और हाथ में था बस एक खाली कॉफी का मग।

पर क्यू?

किस इरादे से? 

इरादा सामने बालकनी में खड़े उस मासूम की बेचैनी परखने का बिलकुल नही था। 

इरादा था कि, उसे मालूम था, 5 बजे.. मतलब फुटबॉल खेलने का समय। सदफ इंतजार कर रही थी उसके दोस्तो का।


सड़क से किसी की आवाज आई

"ज़ीशान...... बॉल लेकर पहुंचों ग्राउंड"


सदफ के गुलाबी गाल, उसके आंसुओ से गीले हो गए। वह बालकनी छोड़ कर चली गई।



सड़क के उस पार, ज़ीशान को कुछ समझ न आया। 

आज वो निकली क्यू नही? उसे पता था कि सदफ परदे के पीछे मौजूद थी। पर आखिर हुआ क्या? कही कुछ गलती हुई होगी। ज़ीशान काफ़ी देर तक सोचता ही रहा। रात के खाने का वक्त हुआ। ज़ीशान की अम्मी ने उसे आवाज लगाई। 

ज़ीशान धीरे-धीरे सीढ़ियों से उतर रहा था की उसने टेबल से अपने अम्मी को अब्बू से बात करते सुना।


ज़ीशान की अम्मी ने कहा

"जलाल साहब है न? उनकी भतीजी कितनी प्यारी है, हाय..... कितनी मासूम। वो इतना रो रही थी जब कार में बिठा कर ले जा रहे थे उसे।"


"कितनी जल्दी बच्चों का दिल लग जाता है न?.... 

सिर्फ हफ्ते भर के लिए आई थी बेचारी।" 


रात का समय था, माहौल बिलकुल शांत, आवाज़ आ रही थी सिर्फ प्लेट के ऊपर चम्मच चलने की।

ज़ीशान अब तक खाने नहीं पहुंचा था। 


"ये ज़ीशान.. आजकल एक भी बात नहीं सुनता" 


अम्मी ने दोबारा आवाज लगाई।

"जीशान..............  "



ज़ीशान सीढ़ियों पर बैठ कर अपनी आंखे पोंछता रहा।

कुछ सवालों से घिरा हुआ, और कुछ जवाबो से परेशान।


उसे शायद अब भी समझ न आया हो,

सदफ का इरादा जो परदे के बाहर न आ सका।

वो तो सदफ की कशिश ही थी की आखिरी कुछ पलों में सदफ ने उसका नाम जानना चाहा। नाम जाने बगैर अगर वो चली जाती तो शायद ये धोखा होता।

सदफ ने धोखा नहीं दिया था।


पर सवाल ये भी है की....

एक परदे ने कैसे रोका होगा दुनिया की सबसे अज़ीम ताकत को?

बात ताज़्जुब की थी। 


पर दरअसल.....  जिस परदे ने सदफ को छिपाए रखा.. वो पर्दा खानदानी था। जिसके ऊपर उसूलों की नकाशी थी। किसीको ये नकाशि दिलकश लगती, तो किसीको बेहद खटकती है। पर पर्दा तो खानदानी है, जैसा भी हो, फेंक नही सकते।


सदफ 'सैयद' खानदान की थी।

जीशान क्या था? ये तो मालूम नही। पर जो भी था सैयद नही था। 


सदफ परदे के इस पार रहना चाहती है। 

जहां उसके अम्मा और अब्बू है। जिन्हे वो बेहद प्यार करती है। जिनकी मर्ज़ी के आगे उसे कुछ नहीं सूझता।


और परदे के उस पार?.... 

क्या है??


ज़ीशान की अम्मी ने खाना मुंह में रख कर कहा..


"सिर्फ...... फ़िज़ूल की बाते।"









**** समाप्त ****



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