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रूफटॉप

 मैं हूं अभिनव, उम्र 24 वर्ष, रंग गोरा, घुंघरालू बाल, 5'9 की हाईट और वज़न........ अ.. वजन नहीं, बस इस धरती का बोझ।  कहते है कि बुरा समय बीत जाता है।  पर कभी कभी समय इतना बुरा हो जाता है कि इसको बीता पाना ही सबसे कठिन हो जाता है। लोग इसे समझे बगैर ही बस कह देते है इसे 'डिप्रेशन'। पर मै ये नही मानता, और न ही मानना चाहता हूं। क्युकी मैं नहीं करना चाहता अपना मन हल्का, और न ही मुझे किसी से बात करनी है। साइकेट्रिस्ट भी तो बात सुनने के पैसे लेता है। कहा से दू? पापा की जेब से? आम इंसान और एक साइकेट्रिस्ट मे सिर्फ यही अंतर है कि साइकेट्रिस्ट एक कान से सुनकर दूसरे कान से निकाल देता है, पर एक आम आदमी सिर्फ एक कान से सुनकर ही अपनी धारणा बना लेता है। साइकेट्रिस्ट समाधान कभी नही बताता, वह आपका सारा बोझ उठाकर समय की गाड़ी पर रख देता है, और कहता है.........  "खुद को थोड़ा समय दो।" मन तो करता है की अपना दिमाग खोलकर बर्फ में डूबो दू...... महीनो से मेरे दिमाग पर द्वंद चल रहा था, ऐसा कोई दिन नही जब थोड़ा चैन आया हो। पर आज, आज का दिन काफी शांत था। आज गुस्सा कम था और नाक ठंडा, गला भरा ...

मीठा पान

आगे-पिछे, दाए-बाये लोग कतार में बैठे थे, मैं अकेला बीच में खड़ा था, पीठ में एक बैग, काफी संभाल के खड़ा था और ध्यान रख रहा था कि मेरा बैग किसी के मुंह पर जाकर न लगे। कंडक्टर ने मुझे अपना बैग टांग देने को कहा, "जगह नहीं है भैया" मैने उसे इशारे मे समझाया।  एक स्टॉप पर कुछ लोग उतर गए, मैं जिस सीट के पास खड़ा था वो महिला भी उतर गई, मैने सीट ले ली और बैग को गोदी पर रखा लिया।  मेरे बगल में एक आदमी बैठा हुआ था, थोड़ा काला, पेट निकला हुआ, अंकल जैसा....... कान में इयरफोन लगाकर कुछ चबा रहा था, होठ भी रंगे हुए थे। वो जो भी चबा रहा हो उसकी खुशबू/बदबू मैं सूंघ पा रहा था, न चाहते हुए भी। बस अभी भी स्टॉप पर रुकी हुई थी।  "फल्ली लेलो....... फल्ली खाते हुए जाओ......  10 रुपए में..... 10 रुपए"। चिल्लाते हुए एक लड़का सामने से बस चढ़ता है और पीछे से उतर जाता है।  उसके उतरने के बाद मेरे बगल वाला इंसान उसे खिड़की से आवाज लगता है "फल्ली ला यार"।  पता नही उसने गुटका कहा थूका, मगर अब, वह फल्ली खा रहा था। वैसे तो मेरे आदर्श काफी अच्छे है, मैं सबको अपने हिसाब से रहने की पूरी छूट देता...

फ़िज़ूली

बालकनी पर बैठे दो चिड़ियों को प्यार करते देखा है कभी? बात जीतनी मामूली है उतनी ही प्यारी भी। खैर चिड़ियों की बात तो मामूली है, पर जब दो अलग बालकनी की बात करी जाए, जैसे बीच में सड़क हो और आमने सामने घर, और हवाओ में महकता प्यार हो। जब बालकनी सिर्फ बालकनी न होकर शोकेस हो जाए, जिसमे जवान दिलों के फूल खिले, तब बात कुछ और है। सदफ फिरसे बालकनी पर बैठे उसका इंतजार कर रही थी, कॉफी हाथ में लिए, बेचैन दिल के साथ। बात तो उस लड़के को भी अच्छी तरह पता है कि सदफ सिर्फ उसे ही देखने बालकनी पर आती है, फिर भी ये हिचकिचाहट कैसी? सदफ का दिल जीतना खुला है.... उतना ही शर्मिला था वो बेवकूफ।  आज सदफ का बेचैन होना भी जायज़ था, क्युकी कल जब वो आया था, अपनी बालकनी पर, हिचकिचा रहा था, नखरे कर रहा था, पर आखिर में पल भर के लिए सही, नज़रे मिल ही गई। आंखे चुरा कर देखने का सिलसिला पिछले तीन दिनों से जारी था। हर रोज कुछ न कुछ नए इशारे होते। ये सब होने के बावजूद भी बात ज़रा कच्ची रह गई है। और उसी लालसा में सदफ बालकनी में हाजिरी लगाए बैठी है। उसी पल के इंतजार में बेचैन। बेचैनी ऐसी की कॉफी हाथ में है, पर पीने वाले को ह...

कमरा किराया और मैं

मैं एक कमरे में अकेले रहता हूं। इसका मतलब ये नहीं की कमरा मेरा है। कमरा, किराए का है। वो हर महीने आती है, बस एक बार। मैं तो चाहता हूं की किराया कही न जाए, बस मेरे पास ही रहे, हमेशा।  किराया इक लड़की है, और उसे पटा पाना मेरे लिए मुश्किल। पटा भी लो तो अगले महीने फिर से पटाओ, मामला ज़रा आपसी है। वो मेरा ध्यान भी रखती है। मेरे उठने से पहले टंकी में पानी भर देती है, नल या पंखा खराब हो तो तुरंत सुधार देती है। किराए की वजह से ही शायद मैं बेफिक्र होकर सो पता हूं। उसने कुछ नियम भी बनाए है मेरे लिए। जैसे की मैं हीटर या कूलर इस्तेमाल नहीं कर सकता, वो सोचती है की यह कर के मैं बिजली की तरफदारी कर रहा हूं। बात ज़रा हास्यास्पद है, पर बिजली को वो अपना सौतन मानती है।  एक दिन अचानक मैंने किराए को कमरे से बात करते देखा। बेशक किराया उससे मेरे बारे में ही पूछ रही थी, पर कमरा हर बार की तरह.... खामोश। मैं पीछे खड़े सब देख रहा था। किराये ने मुझे देख लिया, उसने मुझसे कुछ पूछना चाहा, पर मुंह फेर कर चली गई। वो नाराज़ थी क्युकी इस महीने मैने उससे बात नही की। पर मुझे पता है वो अगले महीने फिर आयेगी, दो सवा...

पालतू

अपने काउंटर पर बैठकर मदन टीवी देख रहा था, एनिमल प्लानेट, हाथियो का बड़ा सा झुंड और पीले घास के पीछे घात लगाये शेर। आगे क्या होने वाला है यह मदन अच्छी तरह जानता था। बचपन से देखता आ रहा था वह यह सब। उसे पता था कि समय बदल जाने से शेर के शिकार करने के तरीके नही बदलते। आज भी शेर हाथी के बच्चे के बिछड़ने का इन्तजार कर रहा था, और शेर हमेशा से ही यही करते आ रहे है।  मदन बड़े गौर से टीवी की ओर देख रहा था, पर मन से कही और ही था।  उसके कानो मे आवाजे गूंज रही थी....... जंगल की आवाज़, पेड़-पौधे, हवा से लहराते बड़े पीले घास, हाथियो का शोर, चिड़िया..चहक.... कबूतर का गुटरगू ....... तोते की आवाज़.... फिर भौ-भौ......... फिर मियाऊ-मियाऊ................... फिर घिसे हुए दरवाजे की आवज अचानक से सब दबा देती है। उसी आवज से मदन को चेतना आ गयी, वह तुरंत खड़ा हुआ।  "Welcome to Pet World sir" मदन ने मुस्कुराकर कहा। सामने खड़ा शख्स बस दुकान के हर एक चीज़ को निहारे जा रहा था।  यह देखकर मदन ने फिर से कहा "May I help you sir?" यह दो लाईन अंग्रेज़ी न बोलने से ग्राहक को बुरा लग सकता था। आखिर मैट्रो सिटी जो है...