मीठा पान

आगे-पिछे, दाए-बाये लोग कतार में बैठे थे, मैं अकेला बीच में खड़ा था, पीठ में एक बैग, काफी संभाल के खड़ा था और ध्यान रख रहा था कि मेरा बैग किसी के मुंह पर जाकर न लगे। कंडक्टर ने मुझे अपना बैग टांग देने को कहा, "जगह नहीं है भैया" मैने उसे इशारे मे समझाया। 


एक स्टॉप पर कुछ लोग उतर गए, मैं जिस सीट के पास खड़ा था वो महिला भी उतर गई, मैने सीट ले ली और बैग को गोदी पर रखा लिया। 


मेरे बगल में एक आदमी बैठा हुआ था, थोड़ा काला, पेट निकला हुआ, अंकल जैसा....... कान में इयरफोन लगाकर कुछ चबा रहा था, होठ भी रंगे हुए थे। वो जो भी चबा रहा हो उसकी खुशबू/बदबू मैं सूंघ पा रहा था, न चाहते हुए भी।


बस अभी भी स्टॉप पर रुकी हुई थी। 

"फल्ली लेलो....... फल्ली खाते हुए जाओ...... 

10 रुपए में..... 10 रुपए"। चिल्लाते हुए एक लड़का सामने से बस चढ़ता है और पीछे से उतर जाता है। 

उसके उतरने के बाद मेरे बगल वाला इंसान उसे खिड़की से आवाज लगता है "फल्ली ला यार"। 

पता नही उसने गुटका कहा थूका, मगर अब, वह फल्ली खा रहा था।

वैसे तो मेरे आदर्श काफी अच्छे है, मैं सबको अपने हिसाब से रहने की पूरी छूट देता हूं।

मगर इस वक्त, मैं इस आदमी को आंक रहा था। मेरा मन अपनेआप धारणाएं बना रहा था..... जितनी फल्लिया वह खाता, उतना ही मैं उससे आंख फेरने की कोशिश करता। 


"यहां मेरे पास कोई लड़की भी तो हो सकती थी न..... इस इंसान को किसने बिठाया?" मैं भगवान से शिकायत कर रहा था।

बगल वाला आदमी मेरे दिमाग में पक रहे खिचड़ी से अंजान था, या शायद उसे फर्क नहीं पड़ता की मेरे दिमाग में आज क्या पाक रहा है, वैसे भी उसने फल्ली खरीद रखा था। 


देखते ही देखते l

आखिरकार उसकी फलिया खत्म हुई। 

बस भी भरने लगा था। काफी लोग खड़े थे।


उसने हाथ झर्राया, मुंह पोछा और कहा

"कहा जा रहे भाई"?

मैने कहा "रायपुर"

"रायपुर से"?  उसने पूछा

मैने कहा "खैरागढ़" 

"अच्छा खैरागढ़.... संगीत विश्वविद्यालय"? 

"हां" मैने कहा

आदमी- गाना वगैरा गाते हो क्या?

मैं- नही (हस्ते हुए) पेंटिंग करता हूं। 

आदमी- अच्छा.. पेंटिंग...... कोनसा ईयर?

मैं- 2nd ईयर है इस बार

आदमी- कहा से हो आप?

मैं- सरगांव

आदमी-  तो मुंगेली से होकर जाना था न यार, पास पड़ता वहा से।

मैं- (हस्ते हुए) नही, अच्छा बस नहीं मिलता वहा से। 

आदमी- अच्छा। फिर रायपुर से बस चेंज करोगे?

मैं- हां

उसने सिर हिलाया। 

अब उसने अपने इयरफोन उतार दिए थे।

कुछ देर तक बस चलती रही।

फिर उसने पूछा 

"नाम क्या है भाई"?

मैने कहा "विजय मंडल" 

"मंडल टाइटल कभी सुना नही हूं यार" उसने मुस्कुराते हुए कहा। 

मैने कहा "बंगाली हूं" 


"बंगाली हो!! लगते नही भाई" मुस्कुराकर उसने कहा।

मैं भी मुस्कुराते हुए सिर हिलाया। 


ये तो इतना अच्छा इंसान निकला, मै यू ही उससे नजर चुरा रहा था।


कुछ समय बाद.....

"मेरी वाइफ बंगाली है" उसने धीरे से बताया।

"ओह अच्छा.........."

"लव मैरिज"? मैने धीरे से पूछा।


मुझसे ये बाते करते हुए वो बहुत खुश नजर आ रहा था। उसके आंखो में बहुत खुशी थी। जैसे उसने कोई पुरानी तस्वीर देख ली हो, अपने शादी की।


"30 साल हो गया है हमारी शादी को"

उसने बताया।

वह बहुत मुस्कुरा रहा था। उसका रंगा हुए होठ भी अब बड़ा प्यारा नज़र आने लगा।

"अभी दो बच्चे हैं मेरे...... दोनो साले बंगाली सिख गए, मैं ही बच गया हूं"

उसने ठहाके लगाकर कहा।

ये इंसान मुझे अपनी आत्मकथा में खीच रहा था, और मुझे भी कोई ऐतराज़ नहीं, मैं भी हसा।

मुझे उसके बारे में जानकर दिल से खुशी हुई।

मैं और जानना चाहता था।

मैने पूछा "घर वाले मान गए थे"?

वह फिर से खो गया....... थोड़ा सोचने के बाद उसने कहा "मेरे घर से तो 'हां' था, पर उसके घर वाले बहुत मना किए"।

"फिर" मैने पूछा।

"फिर वो जिद की....... मेरे लिए" 

उसने गर्व के साथ कहा।

"वो तो बोल ही दी घर में , कि, अगर मेरी शादी इससे नही कराए तो मैं मर जाऊंगी" हस्ते हुए उसने बताया।

मैं समझ नही पाया की इस बात पर मेरी प्रतिक्रिया कैसी होनी चाहिए, मैं सिर्फ मुस्कुरा दिया। 

"मैं खुद जाकर उसे समझाया, नही हो सकती ये शादी, तू और मैं अलग अलग है...... पर वो नही मानी" 

"फिर तो करवाना ही पड़ा शादी" हस्ते हुए उसने बताया।

"अभी सब ठीक है न? सब खुश है?" मैने पूछा


"हां, अभी सब ठीक, जब भी मैं कलकत्ता जाता हूं, अपने ससुराल। जितने दिन तक रुकता हूं उतने दिन तक मछली...... हा हा हा हा।" वह मजे से बता रहा था।

मैं भी हस्ता रहा।


बस चल रही थी, खड़े हुए लोग हिलते डुलते हुए जा रहे थे। काफी घना हो गया था बस, पर कंडक्टर का मन नहीं भर रहा था। 


"रोक रोक रोकले" 

"कहा जाना है?"


............ "आजा" 

"जगह बना भाई, साइड दो थोड़ा थोड़ा" 


दरवाजा धम्म से बंद करते हुए....

"चलो" 


रोज का काम है कंडक्टर का।


अच्छा है की ये कंडक्टर तेज है।

अगर मैं कंडक्टर होता तो इतने लोगो को इस खटारे बस में नही भर पता। 

कंडक्टर ही तो है, जो लोगो को भरोसा दिलाता है कि.... अभी और भी जगह है, आप अब भी फिट हो सकते है, कोई देरी नही हुई। 


"क्या पेंटिंग करते हो आप?" 

मेरे बगल वाले ने अचानक पूछा।


मैं इस सवाल के लिए तैयार नहीं था, मैने सोचते हुए उत्तर दिया "कुछ भी.... जो दिखता है.."


वह इस उत्तर संतुष्ट भी हो गया? 

पता नही...... पर उसने अपना भाव ऊपर टांगकर कहा "अच्छा अच्छा"

"आपके घर वाले भी सपोर्ट करते होंगे" उसने पूछा।

मैं मुस्कुरा रहा था.... 

"नही मतलब, इतना दूर भेज रहे है घर से, तो सुपोर्ट तो पूरा होगा" मुझे देख उसने सुधारने की कोशिश की।

"हां, सपोर्ट करते है" मैने सिर हिलाते हुए जवाब दिया।

"नही, क्या है कि, इस सब्जेक्ट में जाने से थोड़ा डरते है न लोग। आगे कुछ हो पाएगा या नही। है न?"

मैने कहा हां।

"नही सही है, जो अच्छा लगे वही करोगे तो आगे बढ़ोगे। है की नही भाई?" बड़े उत्साह से उसने कहा।

मैने पूर्ण सहमति जताई।


गाड़ी धीरे चल रही थी, रुक रुक कर। कंडक्टर हर मोड़ से सवारी घुसाता था। अभी रायपुर पहुंचने में देरी थी। 

तब मुझे एहसास हुआ की.... अब बातचीत की बारी मेरी है।

"आपका नाम भैया?" मैने अचानक से पूछा।

"रेशम ठाकुर" उसने बताया।


बस में लोग तो अलग-अलग प्रकार के होते ही है और नाम भी इतने उटपटांग, मैं सोचकर हस रहा था। 


"आप रायपुर के ही हो?" मैने पूछा

"एकदम प्रॉपर रायपुर, उतरोगे न बस स्टैंड पे, तो पूछना ठाकुर लोगो का घर कोनसा है?.... कोई भी बता देगा" बड़े रौब से उसने कहा।

मैं भी काफी खुश हुआ, जानकर की मेरे पास बैठा इंसान इतना मशहूर है।

मैं मन ही मन हसने लगा ये सोचकर कि.... इस इंसान को जाने बिना मैने इसके बारे में क्या क्या सोच रखा था। वो भी सिर्फ उसे बाहर से देखकर।


हां गुटका खाना खराब तो है, पर जब पता चले कि गुटका खाने वाला तो फलाना नेता है, या फलाने प्रॉपर्टी का मालिक है, तो फर्क नहीं पड़ता की वह क्या खाता है। क्युकी आप गुटका नही चबाते, अच्छी बात है। पर अभी भी आप बेरोजगार ही है। 


मैं अपने मन के मंदिर से बाहर आया। देखा काफी भीड़ है। सोचने लगा, ये क्या क्या चलता है दिमाग में? मैं मन ही मन हसा। गुटका खाने से कमियाब कौन होता है? वो तो पान मसाला खाने से होते है कामयाब। 


खिचड़ी पकाते पकाते मैं सो गया। 

.....………………………………………


"भाई मैं उतार रहा हु यहां, ये बस बहुत लेट करेगा"


मेरी नींद खुल गई।


"कंडक्टर को बोल दिया हूं, आपको खैरागढ़ का बस दिखा देगा वो। बैग, पर्स संभाल के जाना, बहुत जेबकतरे लोग घूमते है आजकल" 


"अच्छा ठीक है भैया, थैंक यू।

........ आप भी संभल कर जाओ" 


"ठीक है भाई"


"और भाभी को नमस्ते कहना" मैने हसकर कहा।

"अरे जरूर जरूर" 

हाथ मिलाकर वह उतर गया।


बस अब खाली होने लगी, मैं दो सीट लेकर बैठ गया। एक में मैं और एक में मेरा बैग।


रेशम के जाने के बाद बस खाली सा लग रहा था, खाली बस किसको नही पसंद, पर खाली कान..... अच्छा नही लग रहा.. उसकी कहानियां सुनने में काफी अच्छी थी...... 


कहानियां?? 

जीवनी क्यू नही??

होंगी जीवनी.... पर मेरे लिए तो कहानियां ही थी।

वो कहानी जिससे मेरा अच्छा खासा मनोरंजन हुआ। 

वो कहानी जिसे मैं दो पल की खुशी पा सका, इतने भीड़ में।

पर क्या रेशम को मेरी कहानी पसंद आई होगी?

ना...... मुझे तो नही लगता। फिर भी उसने मेरे बारे में पूछा........ अच्छा इंसान था। हां, भले ही उसने मुझे फल्लि के लिए नही पूछा..... फिर भी।


बस में इतना ही साथ मिल जाए तो लंबा सफर भी आसानी से कटता है।

पास में लड़की बैठी होती, तो न वो कुछ कहती न मैं कुछ कह पाता। मैने भगवान को धन्यवाद कहा।


"अपना अपना सामान उठा लो भैया, रायपुर पहुंच गए है।" कंडक्टर ने कहा।


गाड़ी रुक गई। सब बस से निकल रहे थे, मैं भी अपना बैग लेकर निकल गया। 

"अरे भाई....... " कंडक्टर ने मुझे आवाज लगाया।

मैं पास पहुंचकर उसकी तरफ देखा।

उसने सामने दूर कही उंगली दिखाकर कहा, "वो बस खैरागढ़ के लिए है, 3 बजे छूटेगी, उसमे जाओ।"

"ठीक है भैया"

ठाकुर साहब को याद करके मैं मंद मंद मुस्कुराया।

कंडक्टर के बताए हुए दिशा में आगे बढ़ा, और एक टपरी पर जाकर बैठ गया।

अभी 3 नही बजे थे। 


"भाई एक प्लेट नाश्ता लगा दे" मैने कहा।


इस छोटी सी जगह में इस वक्त मैं अकेला ग्राहक था। 3 बजने को अभी देर है। सोचा की टपरी वाले लड़के से ही थोड़ी बात कर लू..... 


लड़का नाश्ता लेकर आया.. 

"यहां ठाकुर लोगो का घर कोनसा है भाई?"

मैने पूछा

"कौन से वाले ठाकुर? बहुत है यहां।"

"ओ.. अच्छा..... रेशम ठाकुर।" मैने कहा

"ये कौन ठाकुर है यार? मुझे तो याद नही आ रहा"

उसने कोशिश करते हुए कहा।

"अच्छा ठीक है, कोई बात नही" कहकर मैं खाने लगा।"


इस छोटी सी जगह में इसने अच्छा पोहा बनाया था। पेट और दिल दोनो भर गया।

मैं मुंह पोछकरकर, उसे पैसे देने गया। 

"आप चिराग ठाकुर का घर पूछ रहे है?"

उसने मुझसे पूछा।

मैं समझ नही पाया। 

मेरा शकल देख कर उसने कहा "अच्छा आप बैठो यहां, और बताओ आपको किसके घर जाना है?"

"चिराग ठाकुर कौन?" मैने पूछा।

लड़के ने आगे पीछे देखा और धीरे से कहा

"यहा का बदनाम आशिक है। कुछ 25 30 साल पहले कांड कर दिया था।"

"क्या हुआ था?" मैने पूछा

"एक बंगालन लड़की के साथ उसका चक्कर था। जब लड़की के घर वाले शादी के लिए नही माने तो लड़की अपना जान दे दी। कहते है चिराग ही भड़काता था उसे।"

मैं ध्यान से सुन रहा था।

"बहुत तमाशा हुआ था। पुलिस, एंबुलेंस सब"

"फिर" मैने पूछा 

"लड़के को पकड़ कर ले गए थे। पर पैसे वाला हैं न भैया, छूट गया होगा पैसे खिलाकर" 


"अभी क्या करता है?" मैने टोकते हुए कहा।


"कुछ नहीं करता, अपने भैया का खाता है। शादी तो किया ही नहीं" उसने कहा


"शादी नही किया?" मैने पूछा


"किस मुंह से शादी करेगा भाई, और कोई करेगा भी क्यू" 


"लड़की का नाम क्या था?" मैने पूछा


उसने कहा "रेशम.... रेशम नाम था लड़की का"


"एक मीठी पान बना दो न भैया" मैने कहा


उसके चेहरे पर कहानी पूरा न सुना पाने का असंतोष था। मगर मुझे पूरी कहानी जान पाने की खुशी, जिसका आनंद मैं पान खाते हुए लेना चाहता था।

अब मैं समझ पा रहा था कि बस में मेरे पास कौन बैठा था। और वो क्या चबा रहा था। 

मैने भी वही चबाना शुरू कर दिया..... गुटका??....... नही नही.. मीठा पान....... इसी मीठे पान के नशे में उसने अपना नाम रेशम ठाकुर बताया। और मैने मान लिया की वो रमेश ठाकुर ही था। क्युकी मैं चिराग को नही जानता।


"ये मीठी पान खाकर ऐसा लगता है, कि किसी अलग दुनिया में हूं।" आंख मूंदकर मैने लड़के से कहा।

लड़का शायद मुझे अजीब नज़रों से देख रहा था। पर मै अपने दुनिया में था.... मीठी दुनिया, जहा कड़वाहट न हो। 


चिराग एक कड़वाहट है। जो मीठे पान में नही डाला जायेगा। इस पान में होंगे सिर्फ मीठे तत्व। मीठे लोग, जैसे बीवी, बच्चे, ससुराल, और ससुराल में पकी मछलियां। 

रेशम ठाकुर ने पान इतना रसदार बनाया था की मेरे मुंह में भी पानी आया था। 


3 बज गए, एक किसी बस का कंडक्टर चिल्ला रहा है........... 

"खैरागढ़, खैरागढ़, खैरागढ़ वाले.......... "

"अखरी बस है.................. खैरागढ़"


मैं आंख मूंद कर पान की मिठास सोकता रहा.....


मैने अपनी बात हवाओ से कही...... ताकि ये बात रेशम ठाकुर तक भी पहुंच सके..

"आपके पान बेशक बहुत रसीले थे, पर पान आपने अकेले नहीं खाया। मेरे होठ भले रंगे न हो पर पान बहुत मीठी थी...."


फर्क बस इतना था की मेंरे मसाले अलग थे......


पर एक बात हम दोनो बराबर जानते थे। कि ये पान की मिठास है, मुंह में मेहमान बनकर आती है।


मेरे पीछे से खैरागढ़ की बस निकल गई......

इंजन का आवाज अपने साथ भीड़ का कोलाहल लेकर चल पड़ा।


मैने भले अखरी बस मिस कर दी हो पर उसने तो बस मिस नही किया....

पक्का 3 बजे वाली बस पकड़कर मिठास चली गई...... मुझे फीका छोड़कर।



……समाप्त…………………………



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